अर्क बनाने की विधी 2021 ,अर्क के फायदे ,उपयोग | ark banane ki vidhi |

अर्क बनाने की विधी ,अर्क के फायदे ,उपयोग | ark banane ki vidhi | 

अर्क का परिचय | 

अर्को के औषधि तत्व के रूप में होने के कारण तथा हल्का एवं शीघ्रपाकी होने के कारण अर्क पेट में जाकर शीघ्र ही अपना प्रभाव प्रकट करते है | 

इसके अलावा अर्को के द्रव पतले रूप में होने से सेवन करने में भी बड़ी सुविधा रहती है | यही कारण है की आयुर्वेदिक चिकित्सापद्धति में अर्को का प्रयोग दिन -प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है | आज शायद ही कोई वैद्य ऐसा मिले जो अर्को का प्रयोग न करता हो | अर्को के इस बढ़ते हुए प्रचार को देखते हुए यह अत्यंत आवश्यक है कि आयुर्वेदिक औषधि स्वरुप इस प्रस्तुत ग्रन्थ में स्वतंत्र रूप से अर्क -प्रकरण दिया जाय ,जिसमे बनाने वाले चिकित्सको तथा उपयोकर्ता को मुख्य रूप अर्को के योगो ,निर्माण विधी तथा गुण -धर्मो की समुचित जानकारी प्राप्त हो सके | 

अर्क बनाने की विधी | 

जिस द्रव्य का अर्क निकालना हो वह यदि मुलायम रूप में हो तो उसे साबुत ही (जैसे -अजवायन ,सौंफ ,जीरा ,मकोय ,ब्राम्ही ,शंखपुष्पी ,पटोलपत्र ,गुलाबपुष्प, गुलबनफसा )आदि कठोर द्रव्य होने पर (जैसे खादिर काष्ठ ,चन्दन सफ़ेद ,चन्दन लाल ,विजयसार ,नीम की छाल ,गिलोय ,उसबा ,चोपचीनी आदि )के छोटे -छोटे टुकड़े करके लोहे के खलबट्टा में कूटकर जौकुट दरदरा चूर्ण करके सायंकाल कलईदार साफ बर्तन में या मिट्टी के बर्तन में आठ गुने साफ जल में भिगोकर ढककर रख दे | 

दूसरे दिन सुबह ही साफ किये हुए नाडिकायंत्र में डालकर यंत्र के ऊपरी भाग को कपड़मिट्टी लगाकर या प्लास्टर ऑफ़ पेरिस आदि से सन्धिरोध कर दे |( पुराने समय में उड़द के आटे को जल में सान कर ,उससे संदीबन्ध करते थे)इसके बाद यन्त्र को चूल्हे या भट्टी पर रखकर नीचे आग जलानी चाहिए ,यह न अधिक तेज और न अधिक धीमी होनी चाहिए , मध्यम होना चाहिए  | यदि आग बहुत अधिक धीमी है ,तब भी जल में वाष्प नहीं उत्पन्न होती है ,फलतः अर्क नहीं बन पाता | आग तेज होने पर उत्ताप अधिक बढ़कर औषधि खरपाक हो जाती है ,जिससे अर्क के रंग मटमैला ,गन्दलापन ,कालापन ,आ जाता है और गंध भी हो जाती है | अतः तेज आँच से निकाले हुए अर्क सेवन योग्य नहीं होते है|  मध्यम आग पर पकाये हुए अर्क स्वच्छ ,पारदर्शक ,और गंधयुक्त होते है | अर्क निकालते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए की पात्र के ऊपरी भाग के जलाधार में डाले हुए जल में जब -जब वाष्प उठने लगे तो जल निकालने की नली का कार्क खोलकर गरम पानी निकालकर पुनः कार्क लगाकर ठण्डा पानी भर देना चाहिए ,ऐसा करने से अर्क अच्छा और साफ निकलता है | 

आधुनिक प्रकार का यन्त्र हो तो उसमे बराबर पानी बदलने की आवश्यकता नहीं रहती है ,क्योकि उसकी अर्क वाष्प निकलने की नली जल -भरे ड्रम में फिट कर ,अर्क बनाने के पात्र से फिट रहती है और इस जल भरे ड्रम में भी नीचे के भाग में उस ड्रम के ऊपरी भाग के ऊंचाई पर ठण्डे प[पानी के नीचले भाग से फिट होकर आनेवाला ठंडा पानी आने वाली नली में फिट रहती है ,जिससे बराबर ठंडा पानी ड्रम में आता रहता है | जिस साइज की मोटी यह ठंडा जल आने की नली फिट रहती है ,उसी साइज की नली ड्रम के ऊपरी भाग में गरम पानी ,निकलने के लिए फिट रहती है ,जिसके परिणाम स्वरुप ठंडा पानी ड्रम में आता है ,उतने ही परिणाम में गरम पानी ड्रम से बाहर निकालकर थोड़ी दूर पर बने हुए हौज या रखे हुए दूसरे ड्रम में जाकर ठंडा होता रहता है | 

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इस प्रकार गरम पानी अपने -आप बाहर निकलता रहता है और उसकी जगह ठंडा पानी अपने आप आता रहता है | कलकत्ता ,बम्बई ,आदि बड़े शहरो में अर्क निकालने की प्राचीन विधी और आधुनिक विधी से बने दोनों ही प्रकार के यन्त्र बने -बनाये मिल जाते है | सुविधा की नजर से आधुनिक विधी से बने यन्त्र विशेष उपयोगी है | वर्तमान समय में इनसे भी अधिक सुविधायुक्त स्टीम या विधूतताप से काम करने वाले यंत्रो का भी आधुनिक विज्ञान ने अविष्कार कर लिया है ,जितना उपयोग विदेशी दवा बनाने वाली फार्मेसी कर रही है | आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माता भी इनका उपयोग कर लाभ उठा सकते है | कॉर्क निकालने के लिए द्रव्य को जितने पानी में भिगोया जाय उसके 2 /3 भाग अर्क निकल जाने पर अर्क निकलना बंद कर देना चाहिए और यन्त्र के नीचे आँच को बाहर निकालकर बुझा दे ,इससे अधिक अर्क निकल जायेगा तो फिर द्रव्य का खरपाक होकर पूर्वोक्त पर निकाले गए अर्क के समान गुणहीन अर्क निकलेगा और वह पहले निकले हुए अर्क में गिरकर उसे भी खराब बना देगा | अतः ऐसा न होने पाये ,इस पर विशेष ध्यान रखकर अर्क निकालना चाहिए | 

जिस पात्र में निकाला हुआ अर्क संचित हो वह पात्र भी कलई किया हुआ या एनामेल अथवा चीनी मिट्टी का हो एवं साफ और स्वच्छ होना चाहिए ,तथा इस पात्र पर ढक्कन लगा रहना चाहिए ,ढक्कन में अर्क निकालकर आने की नली फिट करने का छेद (सुराख )रखना चाहिए | अर्क निकाल चुकने के बाद पात्र को अलग हटाकर छेद में कार्क फिट करके ठंडा होने को रख दे | ठंडा हो जाने पर पात्र को ढक्कन हटाकर अर्क को नाप कर प्रति 1 गैलन अर्क में आधा औष के हिसाब से उत्तम पीसी हुई खूब सफ़ेद खड़िया का चूर्ण मिलाकर 2 -3 घंटे पढ़ा रहने दे | बाद में चार तह के मोटे कपड़े या फ़िल्टर बैग से छान ले | ऐसा करने से अर्क निकलकर एकदम साफ और स्वच्छ हो जाता है | अब इस अर्क को साफ धोकर सुखायी हुई बोतलों में मजबूत कॉर्क लगाकर सील लगा देनी चाहिए | ताकि अर्क की बोतलों में बाहरी हवा प्रवेश कर उनको बिगाड़ नहीं सके | आजकल चूड़ीदार मुँह की बोतले भी बनती है | इन बोतलों में अर्क भरकर इनको फिट करने का फ़िल्टर प्रूफ कार्क लगाकर कार्क कसने की सीलिंग मशीन से कस देना चाहिए | 

इनके लगने पर बोतलों में बाहरी हवा के प्रवेश करने का भय नहीं रहता है | यद्यपि बिल्कुल वायु निरोधक तो इसमें भी नहीं हो पाता है ,परन्तु बहुत कुछ अंशों में वायु का प्रवेश होना रुक जाता है | बाद में बोतलों पर जिस द्रव्य का अर्क हो उसके नाम के लेबिल लगा कर ठन्डे स्थान पर रख देना चाहिए | इस प्रकार विधिपूर्वक रखने से जल्दी नहीं बिगड़ते |

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